Friday, March 9, 2012

kahi charolya ...

एक रंग जुना,
बालपणीचा आवडीचा,
रंगात ह्या 
खुलते मी,
गुल्मोहोरावानी 
फुलते मी,
स्वच्छंद मनाचे सगळे खेळ,
लक्षात येतं सरताना कातरवेळ.
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बासुरीची हलकी साद,
एवल्याल्या पाखरांचा त्यावर प्रतिसाद,
सतत वाहणाऱ्या लाटांची त्यावर दाद, 
पावसाच्या सरीची भर ह्या निसर्गात
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अंगणी माझ्या 
गुलमोहराचा मोहोर,
वाऱ्याला आली एकदा छेडायची लहर,
असंच जाऊन तो गुल्मोहोराशी भिडला,
छेडा-छेडीत त्यांचा अंगणी माझ्या सडां पडला 
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ओंजळीत वाळू भरू पाहिली,
जितकी मुठ घट्ट आवळली,
तितकी ती सुटून गेली, 
मुठ उघडली तर फक्त 
हातावरची रेषाच माझ्याकडे राहिली
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वहीची जुनाट पानं,
उलटतानाचा आवाज,
काही कविता वाचल्या
तेव्हा तुझ्यावर केलेल्या खास

ठेवणीतल्या काही आठवणी 
ताज्या झाल्या
तुझ्या स्वप्नात परत विलीन झाल्या

सुकलेले गुलाब,
अनेकशी पत्रं,
ते एकत्र घेतलेले झोके
ते नातं...उरलं फक्त नाममात्र..!!
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लाजरा मोगरा,
डोकावतोय पानांमागून,
दवबिंदू स्पर्श करू पाहतोय 
त्याला परत परत पडून..
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लाटांची चल-विचल,
वारं सुसाट,
भेभान धुंद रात,
निमुळती काटेरी पायवाट 
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